ओडीओपी में एपण कला: नैनीताल की लोक-विरासत बनी महिलाओं की आजीविका का नया आधार

कुमाऊं की पारंपरिक लोककला एपण (Aipan Art) अब घरों की देहरी और आंगन तक सीमित नहीं रही। नैनीताल जिले की इस सदियों पुरानी लोककला को वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना के तहत नई पहचान मिल रही है। पारंपरिक कला को आधुनिक उत्पादों से जोड़कर स्थानीय कारीगरों, खासकर महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर तैयार हो रहे हैं।
लाल गेरू और सफेद बिस्वार से बनी पहचान
एपण कुमाऊं की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लाल मिट्टी यानी गेरू की पृष्ठभूमि पर चावल के आटे से तैयार बिस्वार के जरिए ज्यामितीय आकृतियां, देवी-देवताओं के पीठ और स्वास्तिक जैसे शुभ प्रतीक बनाए जाते हैं। परंपरागत रूप से इसका इस्तेमाल पूजा, त्योहारों और अन्य मांगलिक अवसरों पर घर के आंगन और देहरी को सजाने में किया जाता रहा है।
नैनीताल के प्रमुख पर्यटन केंद्र होने का लाभ भी एपण कला को मिल रहा है। यहां आने वाले देश-विदेश के पर्यटकों के बीच एपण से बने उत्पाद स्मृति चिह्न के तौर पर पसंद किए जा रहे हैं। इससे स्थानीय कला को बाजार मिलने के साथ ही कारीगरों की आय बढ़ने की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं।
नेमप्लेट से लेकर शॉल-स्कार्फ तक पहुंची एपण
नैनीताल, भवाली, भीमताल और रामगढ़ सहित आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में महिलाएं एपण कला से जुड़ रही हैं। पारंपरिक गेरू और बिस्वार के साथ अब टिकाऊ रंगों का इस्तेमाल कर एपण को अलग-अलग उत्पादों पर उकेरा जा रहा है।
एपण से सजी लकड़ी की नेमप्लेट, टी-कोस्टर, की-रिंग, डायरी कवर, मेजपोश, पूजा की चौकी, फाइल फोल्डर, शॉल और स्कार्फ जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। पारंपरिक डिजाइन और आधुनिक उपयोगिता के मेल से तैयार ये उत्पाद पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं।
घर बैठे मिल रहा रोजगार, बढ़ी आत्मनिर्भरता
स्थानीय एपण कलाकार कविता बिष्ट के मुताबिक, पहले एपण का इस्तेमाल मुख्य रूप से शुभ कार्यों और त्योहारों में घर सजाने तक सीमित था। सरकारी स्तर पर इसे बढ़ावा मिलने के बाद नियमित काम मिलने लगा है। उनके अनुसार एपण से तैयार नेमप्लेट और टी-कोस्टर अब दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं और इससे घर बैठे करीब 8 से 10 हजार रुपये प्रतिमाह की आय हो रही है।
प्रशिक्षण से बाजार तक सरकार का फोकस
एपण कारीगरों को आगे बढ़ाने के लिए राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से विभिन्न स्तरों पर सहयोग किया जा रहा है। कारीगरों के लिए फिनिशिंग, डिजाइन और पैकेजिंग में सुधार से संबंधित कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं। इसके अलावा सरस मेलों, राष्ट्रीय प्रदर्शनियों और नैनीताल के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर स्टॉल उपलब्ध कराकर उत्पादों को बाजार देने का प्रयास किया जा रहा है।
एपण उत्पादों को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है, जिससे स्थानीय कलाकारों को प्रदेश और देश के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच मिल सके।
सीएम धामी बोले- मातृशक्ति को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एपण कला के संरक्षण और संवर्धन पर प्रसन्नता जताते हुए कहा कि राज्य सरकार ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ के संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध है। नैनीताल की पहचान रही एपण कला को ओडीओपी में शामिल किए जाने से प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिली है। उन्होंने कहा कि इस हुनर के जरिए मातृशक्ति को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है और सरकार एपण कारीगरों को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत है।
परंपरा के साथ आर्थिक सशक्तिकरण की नई कहानी
नैनीताल की एपण कला का ओडीओपी में चयन केवल एक प्राचीन लोक परंपरा के संरक्षण की पहल नहीं है। यह स्थानीय संस्कृति, पर्यटन और रोजगार को जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी है। पारंपरिक कला अब आधुनिक बाजार का हिस्सा बन रही है और इसके साथ ही नैनीताल की महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई राह खुल रही है।